कर्नल बैंसला साहब का नेतृत्व और सामाजिक बदलाव

 जागृति - आंदोलन और संघर्ष

कर्नल बैंसला साहब का नेतृत्व और सामाजिक बदलाव


-डॉ. गोपाल गुर्जर  


23 मई 2008 के उस आंदोलन को आज लगभग 17 साल बीत चुके हैं. इस आंदोलन का मई के महीने में घटित होना ही अपने आप में विलक्षण है. जब राजस्थान में तापमान लगभग 50 डिग्री के आसपास होता है. जब सत्ता पर कब्जा किये हुए बैठे लोगों की औलादे AC कमरों में बैठ कर त्राहिमाम कर रही होती है उस स्थिति में एक मार्शल कौम का अपने हक हकुक और अधिकार की लड़ाई के लिए सड़कों और पटरियों पर उतरना अपने आप आश्चर्यजनक है. यह समाज उस माँ का हमेशा ऋणी रहेगा जिसनें कर्नल बैसला जैसे सपूत जनकर समाज को दे दिए. यह आंदोलन वर्षों पुरानी आरक्षण की मांग के साथ-साथ शताब्दियों से खोई हुई पहचान को वापस स्थापित करने आंदोलन था. जिस दौर में स्टेट ने अपनें दमनकारी उपकरणों के माध्यम से जनता द्वारा अपने हक और अधिकार के लिए उठाई जाने वाली मांगों के औचित्य को निरर्थक कर दिया था उस समय में गुर्जर आरक्षण आंदोलन, आंदोलन की सार्थकता को पुन:स्थापित करने का प्रयास था. इस समाज में कर्नल और ब्रिगेडियर बहुत पैदा हुए हैं, लेकिन कर्नल बैसला का पैदा होना अपने आप में विलक्षण है. जिस दिन फौज की नौकरी से वापस आकर कर्नल बैसला ने लाल पगड़ी धारण की उस दिन से वह इस कौम के तारणहार हो गए. 


एक डिस्कोर्स के माध्यम से राज्य द्वारा स्थापित कर दिया गया है कि राज्य के सामने उठाई गई कोई भी मांग या राज्य के खिलाफ किया कोई प्रदर्शन अपने आप में राष्ट्रीय द्रोह से कम नहीं होता है. जबकि यह सोचने का विषय है कि आंदोलन किसी भी लोकतंत्र के मुकुट का ताज़ होते है. राष्ट्रीय संपत्ति और जनहित के नुकसान का जो फिनोफेना आमजन के मानस में गढ़ा गया है, उसके परिणाम स्वरुप किसी भी व्यक्ति या जन समुदाय को सरकार के सामने अपनी मांगों को मनवाने के लिए किए जाने वाले आंदोलन को राष्ट्रद्रोह के समान समझा जाने लगा है. गुर्जर आरक्षण आंदोलन के माध्यम से कर्नल बैसला ने इन स्थापित की हुई धारणाओं को तोड़कर यह साबित किया कि जिंदा कौमे अपने हक हकूक और अधिकारों की लड़ाई के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार है और यह सत्ता को भी स्वीकार करना पड़ेगा कि वे जनता की जायज मांगों को लंबे समय तक दरकिनार नहीं कर सकते. इस आंदोलन की बलिवेदी पर शहीद हुए 76 शहीदों ने अपनी जिंदगी का सर्वस्व इसलिए न्योछावर कर दिया कि इस कौम की आने वाली पीढ़ियों में एक नए जोश ऊर्जा और आत्मविश्वास का संचार कर सके. 


कर्नल बैंसला जैसे सशक्त नेतृत्व और 76 शहीदों के बलिदान के परिणाम स्वरुप 5% आरक्षण का हासिल हमें प्राप्त हुआ है. हालांकि सत्ता के संसाधनों और स्रोतों का इस्तेमाल करने वाले लोगों ने इस 5% रिजर्वेशन को भी मुकम्मल तरीके से लागू होने में हमेशा बधाएँ पैदा की है. फिर भी इसकी वजह से एस बी सी समुदाय के लोग सरकारी नौकरियों में दिखने लगे हैं. 5% रिजर्वेशन की डोर को पड़कर अपनी जिंदगी की वेतरणी पार करने वाले वह लोग जो पहली खैप के रूप में सरकारी नौकरियों और विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए आए, उनके लिए यह सोचने का विषय है कि क्या वह कर्नल बैसला और आरक्षण आंदोलन में शहीद हुए शहीदो की विरासत को अपने अंतर्मन में संजोए हुए हैं या फिर नौकरियों की बदौलत मिलने वाली अच्छी तनख्वाहों से मिलने वाले आनंद में जीवन का लुत्फ उठाने में व्यस्त है. कर्नल बैंसला हमेशा अपने संबोधन में कहा करते थे कि तुम्हारी जिंदगी सार्थक तब है जब तुम किसी एक आदमी के जीवन को सार्थक बना दोगे. जब इस आंदोलन को आज 17 साल गुजर चुके हैं तो कितने लोगों ने इस बात पर गौर किया है पेबैक टू सोसाइटी के विचार के तहत समाज को वापस लौटाया जाए. आंदोलन के पश्चात ज्यादातर नौकरियों में आए हुए वह लोग थे जिनके पास में आर्थिक संसाधन थे, शहरों में रहकर कोचिंग करने के अवसर जिनके पास में थे. मैं देखता हूं कि यह पीढ़ी आज थोथे आदर्शवाद, झूठे राष्ट्रवाद,भजन कीर्तन, सवामणि, हवन, यज्ञ के जंजाल में फंस चुकी है. उनको तनिक भी याद नहीं है कि आरक्षण आंदोलन के पैरलल कर्नल बैंसला द्वारा चलाए गए सामाजिक सुधार के संदर्भ क्या थे. 


कर्नल बैंसला नें भी अपने जीवन के आखिरी दिन निराशा में गुजारें. कर्नल बैंसला अगर आज जिंदा होते तो समाज की दुर्दशा पर अफसोस ही कर रहे होते. आरक्षण आंदोलन के दौर से निकले हुए सामाजिक और राजनीतिक लोगों ने अपने आप को किसी पार्टी का पट्टा गले में डालकर किसी एक विचारधारा के चरणों में समर्पित कर दिया है. एक पल के लिए रुक कर इनको सोचना चाहिए कि यह वही कर्नल बैंसला की विरासत है जिसने यह साबित कर दिया था कि किसी राजनितिक विचारधारा की औकात समाज की दहलीज पर एक जूती से ज्यादा नहीं है. 


मई जून के महीने में जिस गर्मी और उष्णता के साथ में स्वाभिमान और पहचान का यह आंदोलन जिस जोश के साथ शुरू हुआ था आज 17 साल बाद वह जोश भरी गर्मी में भी ठंडा पड़ चुका है. आंदोलन के परिणाम स्वरुप पहली पीढ़ी जो नौकरियों में आई वह अपना मानसिक दिवालियापन स्थापित कर चुकी है. समाज में एलिट और सबाल्टन की खाई स्पष्ट हो चुकी है. एक तरफ समाज का अल्पसंख्यक एलिट वर्ग है जो सुविधाओं के आनंद में मशगूल है और दूसरी तरफ वह बहुसंख्यक सबाल्टन ग्रुप है जो सर्वाइवल के लिए मशक्कत कर रहा है. आंदोलन से निकले हुए लोग पार्टियों के ठेकेदार बनकर वोटो का सौदा करने में व्यस्त है. आने वाली पीढियां के लिए और एस बी सी ग्रुप के लिए किसी के पास में कोई प्लान नहीं है. जिस कौम नें अपने हक और अधिकारों की लड़ाई के लिए लोगों को पुन: एकजुट होकर आंदोलन करना सिखाया वही कौम अपने राजनीतिक और सामाजिक वर्चस्व के लिए नेतृत्व शून्यता के संकट से गुजर रही है. 


ऐसे मुश्किल दौर में अगर इस कौम को कोई लीड कर सकता है वह है कर्नल बैंसला की लाल पगड़ी का प्रतीक. यह वह समय है जब कर्नल बैंसला के नेतृत्व वाले इस आंदोलन से निकले मूल्यों को पुन: स्थापित करने की आवश्यकता है. इतिहास में ऐसे दौर भी आते हैं जब नेतृत्व शून्यता की स्थिति होती है तो ऐसे दौर में कुछ प्रतीक होते हैं जो समाज और कोमो का नेतृत्व करते हैं. यह कर्नल बैंसला की लाल पगड़ी हमारे आने वाले दौर का सबसे बड़ा प्रतीक है. यह लाल पगड़ी स्वाभिमान, समर्पण, लड़ाई, हक़दारी और ऐके का प्रतिक है. यह वह समय है जब समाज के प्रत्येक व्यक्ति को इस पगड़ी को धारण कर कौम, समाज और राष्ट्रहित में आगे बढ़ने का साहस किया जाये. हाथ से हाथ थमा जाये. 


जय कर्नल बैंसला 

लड़ाई जिंदाबाद

आंदोलन जिंदाबाद. 


@डॉ. गोपाल गुर्जर




Comments

Popular posts from this blog

कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला इंटरव्यू

हिम्मत मेहनत और नीयत का संदेश

कर्नल बैंसला ने गुर्जरो को जाति से समाज मे कैसे तब्दील किया