कर्नल बैंसला ने गुर्जरो को जाति से समाज मे कैसे तब्दील किया

 कर्नल बैंसला : जिन्होंने गुर्जरो को जाति से समाज मे तब्दील किया 


अक्सर जाति और समाज को एक ही समझ लिया जाता है. जबकि इन दोनों ही शब्दों की संकल्पना और अर्थो मे बड़ा अंतर है. 


आइए देखते है जाति क्या होती है. जाति शब्द आपस मे विवाह करने वाली, समान गुण रखने वाली एक सामूहिक अभिव्यक्ति है. जैसे मनुष्य एक जाति है. वृक्षों और पशुओं की भी जातियाँ होती है. वस्तुओ की भी जातियाँ होती है. असल मे 'कास्ट' शब्द स्पेनिश -पुर्तगाली भाषा से निकला है. जो किसी समूह की समानताओं को दिखाता है. जाति शब्द एक स्थिर और यथा स्तिथि को बताने वाला नीरस, उबाऊ और निर्जीव शब्द है. 


अब देखते है समाज किसे कहते है. समाज एक ऐसा समूह है जो आपस मे सहयोग करने की क्षमता रखता है. ऐसा समूह जो जीवित और चेतना सम्पन्न है. इस समूह के सदस्य एक दूसरे के लिए सपने देख सकते है. एक दूसरे के लिए सुख और दुख की अनुभूति कर सकते है. इकट्ठा हो सकते है. मिलकर गीत गा सकते है, नाच सकते है. मिलकर लड़ सकते है. मिलकर रचनात्मक निर्माण कर सकते है. 


ऐसा नही है कि कर्नल बैंसला के गुर्जर आरक्षण आंदोलन से पहले गुर्जर जाति के लोग आपस मे सांस्कृतिक क्रिया कलाप नही कर रहे थे. या इस जाति मे सामाजिक गुण नही थे. 

असल मे गुर्जर जाति के लोग समूचे हिंदुस्तान सहित मध्य एशिया के देशो मे अपने अपने सांस्कृतिक परिचय के साथ रह रहे थे. 


भारत मे ही गुर्जर जाति के लोग कई राज्यों मे अलग अलग सांस्कृतिक विशेषताओ के साथ रह रहे थे. 


कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला ने गुर्जर जाति को गुर्जर समाज के रूप मे कैसे बदला आखिर ? 


जब गुर्जर आंदोलन का आगाज हुआ साल 2007 मे. इस आंदोलन की तपीश देश के विभिन्न हिस्सों मे पहुँचने लगी. लहू को लहू ने पुकारा. और समूचे भारत का गुर्जर दूर राजस्थान की भरी गर्मी मे रेलवे ट्रेक पर बैठे अपने भाइयो और बहनो के कष्ट से भीतर तक हिल गया. 


इस सिहरन ने जाति को समाज की जाजम पर ला इकट्ठा कर दिया. समूचे भारत मे रहने वाले गुर्जर जाति के लोग इकट्ठा होने लगे. जाजमे बिछने लगी. अपने लोगो के सुख दुख और सपनों की चर्चा होने लगी. 


कर्नल बैंसला बड़े विजनरी और गहरी आस्थाओ वाले व्यक्ति थे.  

उन्होंने गुर्जर रण नृत्य जैसे प्राचीन नृत्य को पुनर्जीवित करते हुए इसे आंदोलन से जोड़ दिया. आंदोलन स्थल पर रसिया, कन्हैया, उछाटा गीतों की जाजम बिछा दी. जहां गुर्जर जाति एक समुदाय के गुणों को प्रकट करने लगी. 


कर्नल बैंसला ने इस महान लड़ाका जाति को महान समुदायिक सपना दिखाया. बच्चियों को पढ़ाने का. शासन और प्रशासन मे अपनी हकदारी मजबूत करने का. 


जैसे जैसे आंदोलन आगे बढ़ता चला गया. इन पंद्रह सालो मे ये जाति एक सामाजिक पहचान के तौर पर उठने लगी. अब गुर्जरो का पहनावा ( जिस कर्नल बैंसला स्वयं अपना चुके थे. धोती, कुर्ता, जुतिया, साफा ), गुर्जरो के गीत, नृत्य, आपसी मेलजोल उभर कर धरातल पर दिखाई देने लगे. 


और फिर एक समय ऐसा भी आया कि राजनीतिक चेतना को पहचान देने के लिए स्वयं कर्नल बैंसला ने 2009 के लोक सभा चुनाव मे ताल ठोक कर अपने समाज को यह संदेश दिया कि अगर तुम समाज बन गए तो तुम लोग भी संसद मे जाकर अपने हितो के लिए लोकतान्त्रिक तौर पर अपनी बात कह सकते हो. असल मे कर्नल बैंसला के चुनाव लड़ने के बाद पंचायत से लेकर विधानसभा चुनावों मे गुर्जर समुदाय की भागीदारी मे अभूतपूर्व वृद्धि हुई. गाँव गाँव मे गुर्जर समुदाय के लोग चुनाव लड़ने लगे. 


जो राजनीतिक समुदायिकता, आत्मविश्वाश और महत्वकांशा सत्तर वर्षो मे विकसित नही हुई. कर्नल बैंसला ने एक चुनाव लड़कर अपने लोगो को जाति से राजनीतिक समाज मे तब्दील कर दिया. 


कर्नल बैंसला को आज का गुर्जर समाज यूँ ही नही अपना तारणहार और लोकदेवता नही मानता है. बैंसला ने एक जाति को सांस्कृतिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक तौर पर न केवल एक जुट किया. बल्कि उनके लिए बड़े लक्ष्य , बड़े सपने भी विरासत के तौर पर छोड़ गए. 

उन्होंने एक जाति को समाज के रूप मे रूपानतरित कर दिया.





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