कर्नल किरोड़ीसिंह बैसला : 'मेरी पगड़ी ही मेरा राजमुकुट, रेल की पटरियां ही मेरा सिंहासन' ~त्रिभुवन
ये गुर्जर आंदोलन के दिनों से कुछ पहले की बात है। मैं भारतीय जनता पार्टी की बीट देखता था और वह पगड़ीधारी कई बार इस पार्टी के ऑफ़िस में दिख जाता था। लेकिन एक दिन मैं उस अलग से लगने वाले इन्सान की तरफ़ खिंचा चला गया। वजह थी उनके सामने रखी एक किताब। यह पुस्तक नेपोलियन की बायोग्राफ़ी थी। फ़िलिप ड्वायर की लिखी "नेपोलियन : दॅ पाथ टु पावर'। एक पगड़ीधारी और लाठी वाला कद्दावर किसान सा दिखता आदमी और वह भी अंगरेज़ी की किताब पढ़े और धोती भी खांटी अंदाज़ में बांधे तो सहसा आकर्षण का विषय हो ही जाता है। यह जिज्ञासा आधुनिक परिवेश की मेरी या मेरे जैसे लोगों की उस कुंठा से उपजती है कि आख़िर कोई धोती-पगड़ी वाला ठेठ ग्रामीण किसान कैसे अंगरेज़ी की बेहतरीन पुस्तक पढ़ सकता है। उन्होंने बताया था कि युवा नेपोलियन उनका नायक है और वे उन्हें सेना के शुरुआती समय से ही पढ़ते रहे हैं। कर्नल किरोड़ीसिंह बैसला से यह पहली मुलाकात थी। उस संक्षिप्त सी मुलाकात में उन्होंने जो बताया, वह उनके मानीखेज़ व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ कहता था। प्रजा की, देश की, राजसत्ता और खूब सारी ऐसी ही बातें। खेत का खलिहान ही हमारा सिंहासन है, ...