गोली या चिट्ठी ही हमें पटरीयों से हटा सकती है. - कर्नल बैंसला
20 जून 1789 का दिन था. संवैधानिक आजादी की मांग कर रहे फ्रांसीसी क्रान्तिकारियो को ज़ब स्टेटस जनरल के मीटिंग हॉल मे नही घुसने दिया, तो हॉल के बाहर एक टेनिस कोर्ट मे ही इकट्ठा होकर इन फ्रांसीसी क्रान्तिकारियो ने स्वतंत्रता की शपथ ली. इस घटना को 'टेनिस कोर्ट की शपथ ' के नाम से जाना जाता है.
ज़ब फ़्रांस के राजा लूई सोलहवे ने इन क्रान्तिकारियो पर सैनिक कार्यवाही की मंशा जाहिर की, तो क्रान्तिकारियो के नेता मेराबो ने अपनी दृढ इच्छा शक्ति को जाहिर करते हुए कहा, "सिर्फ गोली या चिट्ठी ही हमें यहाँ से हटा सकती है." फ्रांसीसी क्रांति के इतिहास मे मेराबो के शब्द अमर हो गए.
217 साल बाद. मई का महीना था. साल था 2007. गुर्जर आरक्षण आंदोलन चरम पर था. फ्रांसीसी क्रांति के मुरीद कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला तपती गर्मी और झुलसा देने वाली लू के बीच अपने लाखो लोगो के साथ पटरी पर बैठे थे. उन्हें बैठे हुए कोई बीस बाइस दिन गुजर गए थे.
दुनिया भर के दबाव और तनाव के बीच ज़ब किसी पत्रकार ने कर्नल बैंसला के मन को टटोलते हुए पूछा, कि कर्नल साहब कब तक आप यहाँ बैठे रहेंगे. शासन ने आप लोगो को यहाँ से हटाने के लिए बल प्रयोग किया तो आप क्या करेंगे ?
इतिहास फिर से जीवित हो उठा. दुनिया भर की क्रांतियों के पाठक और हिन्दुस्तान के इतिहास मे सबसे बड़े आंदोलनों मे से एक आंदोलन के अगुआ कर्नल बैंसला ने अपने फौलादी इरादे जाहिर करते हुए कहा, "आरक्षण की चिट्ठी या गोली ही हमें पटरीयों से हटा सकती है"
एक लीडर को ऐसा ही होना चाहिये. स्पष्ट. दृढ. और भय रहित.
कर्नल बैंसला लीडरशिप का स्कूल थे.

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