राजस्थान में एमबीसी के रूप में गुर्जर आरक्षण - समयसिंह गुर्जर

 समयसिंह गुर्जर 


                    कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला के नेतृत्व में गुर्जरों को "आदिवासी वर्ग" में शामिल करने की अलख जगाने का श्रेय दिया जाता है,गुर्जर आंदोलन की रूपरेखा इसी मांग और मुद्दे को लेकर केंद्रित की गयी थी।

 राजस्थान में आंधियां बहुत आती हैं शायद इसी से प्रेरणा लेकर कर्नल बैंसला के नेतृत्व में तुफानी आंदोलनों के दौर शुरू हुऐ थे,गुर्जरों के तुफानी आंदोलनों के सामने आंधियों के बंवडर भी फीके पड़ गए थे।लाखों-लाख की तादाद में गुर्जर जहां-तहां हूंकार भरते नजर आते थे,उसका कारण था कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला का सशक्त नेतृत्व। 

लंबे-चौड़े पड़ावों में मांग होती थी "आदिवासी वर्ग" में आरक्षण लेकर रहेंगे!इस मांग को लेकर गुर्जर सड़कों और रेलवे की पटरियों की तरफ निकल लिए थे,शेड्यूल ट्राइब कैटेगरी में शामिल करो ऐसे नारे गूंजते थे, और साथ ही "भगवान देवनारायण की जय"के नारों की गूंज से दिल्ली की सत्ता हिलोरें लेने लगी थी,राजस्थान की सत्ता हिचकोले खाने लगी थी। बैठकों के दौरे पर दौर चलते थे, पटरियों और सड़कों पर जमें आंदोलित गुर्जरों की एक ही मांग होती थी पटरियों और सड़कों पर आरक्षण का पत्र लेकर आओ हमें दिल्ली और जयपुर नहीं जाना।

 कर्नल बैंसला साहब के नेतृत्व ने गुर्जर बिरादरी को पूरी दुनिया में पहचान दी,राजस्थान अपनी शांति और बहादुरी के लिए जाना जाता था, लेकिन कर्नल बैंसला साहब के आंदोलनों के चलते राजस्थान अशांत क्षेत्र घोषित कर दिया गया था।तब गुर्जर आंदोलनकारी इतने हठीले और आक्रामक थे कि उनसे मिलने की जहमत सरकारी तंत्र उठाना नहीं चाहता था। यही कारण था कि हमारे गुर्जर आंदोलनकारियों को अपनी जानें भी गंवानी पड़ी। गुर्जर अपनी मांगों पर अडिग थे। कर्नल बैंसला साहब के कामयाब आंदोलनों के चलते उनका विरोध हमारे ही गुर्जर समाज के लोगों ने भीतरी घात की भूमिका निभाते हुए आंदोलन को कमजोर करने की भरसक कोशिश की गई थी।

 कर्नल बैंसला साहब तीन मोर्चों पर अकेले लड़ रहे थे,

1-राजस्थान सरकार और केन्द्र सरकार, 

2-राजस्थान के कुछ और के नेता 

3- एनसीआर के वह स्वयंभू गुर्जर नेता जो कर्नल बैंसला साहब को फूटी आंख देखना चाहते थे।

इन सबसे कर्नल बैंसला साहब अकेले ही डटकर लड़े और जीते। यहां सवाल खड़ा होता है? कि राजस्थान का गुर्जर समाज एमबीसी आरक्षण लेकर आज राजस्थान के सरकारी तंत्र में अपनी घुसपैठ करने में कामयाब होने के बावजूद भी अभी विरोधी लोगों की कल्हरूपी आत्माएं समाज को विखंडित करने पर तुली हैं!

आज जब कर्नल बैंसला साहब हमारे बीच नहीं हैं जिनके कारण शहीद हुए परिवारों को नौकरी और पांच-पांच लाख की सरकारी सहायता दी जा चुकी हैं, उन्हीं लड़ाकू परिवारों की माताओं बहनों को जगह-जगह घुमाकर गुर्जर समाज को शर्मशार करने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है!

शहीदों की चिताओं पर हर बरस मेले लगने चाहिए,शहीदों को हर बरस श्रद्धांजलि अर्पित करनी चाहिए,लेकिन यह सब जिस महान एमबीसी आरक्षण के पुरोधा की वजह से हुआ उसके अस्तित्व को स्वीकार किया जाना चाहिए उसे नक्कारखाने वाले लोग पहले भी थे और अब भी हैं।

 कर्नल बैंसला साहब हर दौर में प्रसांगिक रहेंगे क्यूंकि उन जैसा महान त्यागी सदियों में एक ही होता है। तख्तियां लेकर घूमने वाले लोग बेशक हमारे ही हैं, लेकिन संदेश स्वर्गीय कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला जी की मरहूम आत्मा को सुकून देने वाला नहीं है। उन्होंने भारत देश और राजस्थान के गुर्जरों को गर्व से जीने और चलने का हक दिया था। देश के गुर्जर जनमानस को स्वर्गीय कर्नल बैंसला साहब की  प्रथम पुण्यतिथि पर मुंडिया अवश्य जाना चाहिए था।जिन नेताओं ने कभी कर्नल बैंसला साहब के अस्तित्व को नहीं स्वीकारा जिनके कारण गुर्जर गोलबंद हुए थे,आज सिकंदरा के के शहीद मेले में शहीदों के परिवार पूरे देश के प्रिय होने चाहिए थे उन्हें अब कुछ गुर्जर समाज के लोग कमतर साबित करने की कोशिश कर रहे हैं।

समय सिंह गुर्जर




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