कर्नल बैंसला : जर्जर मनुष्यता की बस्ती के लोकदेवता

गाँव - देहात की जर्जर और धूल - धूप से लड़ती बस्तियों की एक खास पहचान होती है. वहाँ बस्ति के बीच एक लोकदेवता का पूजा स्थल होता है.

इस पूजा स्थल पर इन अभावग्रस्त लोगों की प्रार्थनाये, असुरक्षा, आशंकाये और छोटे छोटे सपने टंगे होते है. सदियों से न परिस्तिथियां बदलती है, न लोग बदलते है और न ही ये लोक आस्था के केंद्र बदलते है. यथास्तिथिवाद का इससे दयनीय उदाहरण और क्या होगा.

कर्नल बैंसला ऐसे ही दीनहीन और जर्जर समाज मे जन्मे वो व्यक्ति थे. जिन्हे इन लोगो की पीड़ा और दैनिक कष्टपूर्ण दिनचर्या ने इन्ही के बीच एक लोकदेवता के तौर पर स्थापित कर दिया.

फर्क यह था, कि बैंसला मिट्टी और पत्थर के बुत नहीं बने रहे. उन्होंने ताजिंदगी अपनी बस्ति के लोगो के हक और हुकूक की लड़ाई लड़ी. वे कमजोरी के खिलाफ मजबूती का ऐलान लगा कर खड़े हुए. उन्होंने अपने लोगों को ताकत, हिम्मत और जिद का पाठ पढ़ाया.

पंद्रह सालों के भीतर ही उन्होंने गुमनाम चरवाहों को विश्व पटल पर ला खड़ा किया, और दुनिया की मिडिया को इनकी हिम्मत को देखने पर मजबूर किया. एक ऐसा समाज, जो सदियों से पशुपालन करता रहा है. जंगलो और नदी किनारो पर अस्तित्व की लड़ाई लड़ते लड़ते आ रहा है. बैंसला ने उन्ही लोगो से दुनिया की सबसे मजबूत सेना बना कर लोकतंत्र की संस्थाओ की आँखों मे आँखे डाल कर देखने का बल दे दिया.

जब बैंसला से पूछा गया ( CNN इंटरव्यू ) की आपकी इस ताकत का राज क्या है. तो बैंसला कहते है कि Justness of my cause यानी कार्य का औचित्य ही मेरी ताकत है.
यानी अपने लोगो के दुःखो, यातनापूर्ण जीवन को बदलने के कार्य का औचित्य ही उन्हें ताकत देता था.

यही वो बात है. जो बैंसला को साधारण व्यक्ति से उठाकर असाधारण व्यक्तित्व की श्रेणी मे खड़ा कर देती है. उन्हें मानव से लोकदेवता बना देती है.

समाज सेवा और सामाजिक जीवन मे लक्ष्य की पवित्रता और औचित्य के पाठ और जरूरत जब तक रहेगी, तब तक कर्नल किरोड़ी सिँह बैंसला के जीवन को दोबारा तिबारा देखा जाता रहेगा. आखिर वे अपने समुदाय के नायक और लोकदेव है.

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